Wednesday, January 29, 2020

लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं

ख्वाहिशों की डोर से बंधीं, सपनों की  सतरंगी पतंग उड़ी
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
दिल में लाखों  लिए अरमान चली
नन्हें से सर पर ख्वाहिशों का ले ढेरों सामान चलीं लेने उस चांद को हाथों में, देने हर सपने को मुकाम चली
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
दिल में सपनों की पूरी दुकान खुली
छोटे-छोटे कदमों से नापने ये जहान चलीं
मासूम सी मुस्कुराहट से, देने प्यार का इनाम चली
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
क्यों पूछती हैं जिंदगी थीं वो कौन सी गली
ना फिक्र थी जहां वक़्त की, ना जिक्र किसी जुबां का था
जहाँ तोड़ कर हर रस्म मैं बार-बार  चलीं
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
तू जान ले ऐ जिंदगी  हां वो मेरा बचपन ही था
जहाँ बस एक मदमस्त-सी हवा चली
और बन के मैं तूफान चलीं
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
                                                                      K. Gaur

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