Friday, June 19, 2020

ये तकाजा उम्र का है या वक्त का



जाते हैं क्यूँ मायने ढलती उम्र के साथ
लोग मिलतें भी तो हैं जेबें देखकर ।।

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लोग आजकल वजह से मिलते हैं ,
वो अपने थे जो बेवजह मिलते  थे ।।

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बेवजह  क्यूँ रूठता है दिल मेरे ,
अब वो यार नहीं जो यूँ ही मना लेते थे //

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ये तकाजा उम्र का है या वक्त का, जिनकों समझाते रहे हम उम्र भर, वो हमें कहते हैं तुम समझोगे नहीं //

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फासले भी है जरूरी हर रिश्तें  में ,
नजदिकीयाँ ज्यादा हो शिकवे बढ़ ही जाते हैं //

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जाऊँगा मैं छोड़कर तुझे ये  तय हैं याद रखना
बस मेरी यादों को अपने साथ रखना
रोज बात हो, मुलाकात हो, जरूरी नही हम साथ हो
पर दिल के इक कोने में मेरा घर बनाये रखना
जानता हूँ  ये मेरा हक है नहीं, ये ना कर सको तो बस मेरी यादें दिल में बसाये रखना //

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ये किसने दस्तक दी है दिल पे ये कौन है
जानता हूँ मैं - 
वो मेरा अपना नहीं फिर क्यूँ अपना सा  लगने लगा
और जानता है वो  भी- कि मुझे पा ही नहीं सकता फिर क्यूँ  मुझे खोने से वो डरने लगा /‌‌‍/

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Tuesday, February 18, 2020

बड़ा गरूर था मुझे जवानी में अपने वक़्त पर

बड़ा गरूर था मुझे जवानी में अपने वक़्त पर
वक़्त कुछ इस तरह फिसला मेरी मुट्ठी से, खाली हाथों में मुझे बुढ़ापा दे गया
ताउम्र दिखाता रहा मैं राह जिनकों, उनके आने की राह देखती है ये उम्र
खौफ़ मुझे मौत का नहीं, बस थोड़ी  फिक्र अपनों की है
जब  तन्हाईयाँ ढूँढता था ये दिल, बड़ा आबाद था तब ये शहर
आज तन्हाईयाँ सजा लगतीं है और दिल उन यादों के सहारे जिन्दा है


जमाने की खुशियाँ देकर क्यों तन्हा छोड़ गया तू मुझे
लौट आ ऐ दोस्त तेरी आदत हो गयी है अब मुझे
मेरी कमियाँ बताने का जो अन्दाज़ था तेरा
बड़ा खलता  था मुझे
उसकी अहमियत समझ आती है अब मुझे
जब तू साथ था बडे़ शिकवे थे जिन्दगी से
हाथ छोड़कर चला तो ये जिंदगी अब वीरान लगतीं है
                                                                      K. Gaur

Sunday, February 16, 2020

औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ


मैं और जुल्म सहने की हकदार नही हूँ ,औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
दिया अपना सर्वस्व मैंने  तुझे, फिर क्यूँ मैं आज गुनेहगार खड़ीं हूँ
मौन हूँ तो ये नहीं कि मेरा  स्वाभिमान नहीं है
कोई भी पढ़ ले मुझे मैं ऐसा अखबार नहीं हूँ
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
हर बार मैं झुकती रहीं बस एक तेरे मान को
माना तुझे है ऐसे जैसे माना है भगवान को
तो ये नहीं कि मुझे खुद पर गुमान नहीं है
साथी हूँ मैं तेरी , तेरा अधिकार नहीं हूँ
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
अपराध ना मेरा फिर भी अपमान मैं सब सहती हूँ
है जुबां तो मुझको भी पर बेजुबान सी मैं रहतीं हूँ
सहती हूँ मैं सब कुछ तो ये नहीं कि मेरा सम्मान नही है
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
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                                                                    K. Gaur

Wednesday, February 5, 2020

जिंदगी कुछ कर दिखाना चाहता हूँ


ऐ जिंदगी कुछ कर दिखाना चाहता हूँ
खुद के लिए नहीं दूसरों के लिए जीना चाहता हूँ
दिल में तमन्नाओ का जो शहर बनाया है मैंने
मैं उसे बसाना चाहता हूँ
देकर खुशियाँ दूसरों को मैं, खुद मुस्कुराना चाहता हूँ
बनकर मैं इंसान, बस इंसानियत का फर्ज निभाना चाहता हूँ
रौब जो हैं मौत का मेरे जिस्म पर, बस उसे आंखें दिखाना चाहता हूँ
थाम ले गर हाथ मेरा वक़्त ये, हर घाव पर मरहम लगाना चाहता हूँ
नफरतों से वास्ता ना हो किसी का, प्यार की सौगात देना चाहता हूँ
हर तरफ एक खौफ सा है, स खौफ के साये मिटाना चाहता हूँ
डूबना चाहता नहीं इस दरिया में, तैरकर उस पार जाना चाहता हूँ
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                                                                K. Gaur

Wednesday, January 29, 2020

लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं

ख्वाहिशों की डोर से बंधीं, सपनों की  सतरंगी पतंग उड़ी
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
दिल में लाखों  लिए अरमान चली
नन्हें से सर पर ख्वाहिशों का ले ढेरों सामान चलीं लेने उस चांद को हाथों में, देने हर सपने को मुकाम चली
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
दिल में सपनों की पूरी दुकान खुली
छोटे-छोटे कदमों से नापने ये जहान चलीं
मासूम सी मुस्कुराहट से, देने प्यार का इनाम चली
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
क्यों पूछती हैं जिंदगी थीं वो कौन सी गली
ना फिक्र थी जहां वक़्त की, ना जिक्र किसी जुबां का था
जहाँ तोड़ कर हर रस्म मैं बार-बार  चलीं
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
तू जान ले ऐ जिंदगी  हां वो मेरा बचपन ही था
जहाँ बस एक मदमस्त-सी हवा चली
और बन के मैं तूफान चलीं
लेके हौसलों के पंख मैं, खुले आसमां में चलीं
                                                                      K. Gaur

Friday, January 17, 2020

बस प्रेम दिलों में भरता चल

क्या आज हैं मेरा, कल क्या है
ये  कोई समझ ना पाया है
 होगा जो भी अंजाम तो क्या
 है कौन नहीं अंजान यहाँ
क्यों रोकता है तू अपने कदम
क्यों सोचता है क्या होगा कल
बस चलता जा तू सोच नहीं
तू अपने कर्म बना खुद ही
किस्मत अपनी चमका खुद ही
फिर देख तमाशा दुनिया का
 बेगाने भी तेरे होंगे, हर स्वप्न तेरे पूरे होंगे
सब लोग तुझे जानेंगे फिर, और तुझको फिर मानेंगे फिर
पर अभिमान कभी ना करना तू
मन द्वेष कभी ना भरना तू
बस प्रेम न्यौछावर करता चल और प्रेम दिलों में भरता चल । ।
   
                                                                       K.Gaur