Tuesday, February 18, 2020

बड़ा गरूर था मुझे जवानी में अपने वक़्त पर

बड़ा गरूर था मुझे जवानी में अपने वक़्त पर
वक़्त कुछ इस तरह फिसला मेरी मुट्ठी से, खाली हाथों में मुझे बुढ़ापा दे गया
ताउम्र दिखाता रहा मैं राह जिनकों, उनके आने की राह देखती है ये उम्र
खौफ़ मुझे मौत का नहीं, बस थोड़ी  फिक्र अपनों की है
जब  तन्हाईयाँ ढूँढता था ये दिल, बड़ा आबाद था तब ये शहर
आज तन्हाईयाँ सजा लगतीं है और दिल उन यादों के सहारे जिन्दा है


जमाने की खुशियाँ देकर क्यों तन्हा छोड़ गया तू मुझे
लौट आ ऐ दोस्त तेरी आदत हो गयी है अब मुझे
मेरी कमियाँ बताने का जो अन्दाज़ था तेरा
बड़ा खलता  था मुझे
उसकी अहमियत समझ आती है अब मुझे
जब तू साथ था बडे़ शिकवे थे जिन्दगी से
हाथ छोड़कर चला तो ये जिंदगी अब वीरान लगतीं है
                                                                      K. Gaur

Sunday, February 16, 2020

औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ


मैं और जुल्म सहने की हकदार नही हूँ ,औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
दिया अपना सर्वस्व मैंने  तुझे, फिर क्यूँ मैं आज गुनेहगार खड़ीं हूँ
मौन हूँ तो ये नहीं कि मेरा  स्वाभिमान नहीं है
कोई भी पढ़ ले मुझे मैं ऐसा अखबार नहीं हूँ
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
हर बार मैं झुकती रहीं बस एक तेरे मान को
माना तुझे है ऐसे जैसे माना है भगवान को
तो ये नहीं कि मुझे खुद पर गुमान नहीं है
साथी हूँ मैं तेरी , तेरा अधिकार नहीं हूँ
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
अपराध ना मेरा फिर भी अपमान मैं सब सहती हूँ
है जुबां तो मुझको भी पर बेजुबान सी मैं रहतीं हूँ
सहती हूँ मैं सब कुछ तो ये नहीं कि मेरा सम्मान नही है
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
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                                                                    K. Gaur

Wednesday, February 5, 2020

जिंदगी कुछ कर दिखाना चाहता हूँ


ऐ जिंदगी कुछ कर दिखाना चाहता हूँ
खुद के लिए नहीं दूसरों के लिए जीना चाहता हूँ
दिल में तमन्नाओ का जो शहर बनाया है मैंने
मैं उसे बसाना चाहता हूँ
देकर खुशियाँ दूसरों को मैं, खुद मुस्कुराना चाहता हूँ
बनकर मैं इंसान, बस इंसानियत का फर्ज निभाना चाहता हूँ
रौब जो हैं मौत का मेरे जिस्म पर, बस उसे आंखें दिखाना चाहता हूँ
थाम ले गर हाथ मेरा वक़्त ये, हर घाव पर मरहम लगाना चाहता हूँ
नफरतों से वास्ता ना हो किसी का, प्यार की सौगात देना चाहता हूँ
हर तरफ एक खौफ सा है, स खौफ के साये मिटाना चाहता हूँ
डूबना चाहता नहीं इस दरिया में, तैरकर उस पार जाना चाहता हूँ
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                                                                K. Gaur