Tuesday, February 18, 2020

बड़ा गरूर था मुझे जवानी में अपने वक़्त पर

बड़ा गरूर था मुझे जवानी में अपने वक़्त पर
वक़्त कुछ इस तरह फिसला मेरी मुट्ठी से, खाली हाथों में मुझे बुढ़ापा दे गया
ताउम्र दिखाता रहा मैं राह जिनकों, उनके आने की राह देखती है ये उम्र
खौफ़ मुझे मौत का नहीं, बस थोड़ी  फिक्र अपनों की है
जब  तन्हाईयाँ ढूँढता था ये दिल, बड़ा आबाद था तब ये शहर
आज तन्हाईयाँ सजा लगतीं है और दिल उन यादों के सहारे जिन्दा है


जमाने की खुशियाँ देकर क्यों तन्हा छोड़ गया तू मुझे
लौट आ ऐ दोस्त तेरी आदत हो गयी है अब मुझे
मेरी कमियाँ बताने का जो अन्दाज़ था तेरा
बड़ा खलता  था मुझे
उसकी अहमियत समझ आती है अब मुझे
जब तू साथ था बडे़ शिकवे थे जिन्दगी से
हाथ छोड़कर चला तो ये जिंदगी अब वीरान लगतीं है
                                                                      K. Gaur

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