Sunday, February 16, 2020

औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ


मैं और जुल्म सहने की हकदार नही हूँ ,औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
दिया अपना सर्वस्व मैंने  तुझे, फिर क्यूँ मैं आज गुनेहगार खड़ीं हूँ
मौन हूँ तो ये नहीं कि मेरा  स्वाभिमान नहीं है
कोई भी पढ़ ले मुझे मैं ऐसा अखबार नहीं हूँ
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
हर बार मैं झुकती रहीं बस एक तेरे मान को
माना तुझे है ऐसे जैसे माना है भगवान को
तो ये नहीं कि मुझे खुद पर गुमान नहीं है
साथी हूँ मैं तेरी , तेरा अधिकार नहीं हूँ
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
अपराध ना मेरा फिर भी अपमान मैं सब सहती हूँ
है जुबां तो मुझको भी पर बेजुबान सी मैं रहतीं हूँ
सहती हूँ मैं सब कुछ तो ये नहीं कि मेरा सम्मान नही है
औरत हूँ मैं तेरी जागीर नहीं हूँ
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                                                                    K. Gaur

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